पनवेल फेस्टिवल – Celebrating 25 years of Theatre of Relevance

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस पनवेल फेस्टिवल के रचनात्मक कलात्मक और वैचारिक एक्सपीरियंस के कुछ पहलू by स्मृति राज
पनवेल फेस्टिवल, १८, १९, २० दिसंबर, के एक्सपीरियंस का एक पहलू मंजुल भारद्वाज ने आज व्यक्त किया इन तीनों शब्दों के द्वारा – वंडरफुल, यूनिक और इंक्लूसिव।यह तीन शब्द इस पूरे फेस्टिवल का सार है और इसका विस्तार है इस फेस्टिवल का ध्येय जो तीन नाटक के प्रस्तुति के द्वारा हासिल किया गया अपने दर्शकों में और उनके वैचारिक परिवर्तन में। यह परिवर्तन की शुरुआत है, और यह शुरुआत है संवाद से, संवाद तक पहुंचना एक उपलब्धि है क्योंकि आज संवाद के स्तर पर एक दूसरे से समझ की बाते करना बहुत ही मुश्किल और लगभग गायब सा हो रहा है। वैचारिक रुप से नाटक को समझना,उस नाटक के द्वारा की गई मूल विषयों पर चर्चा करना और यह स्वीकार करना की नाटक की प्रस्तुति से उनकी मन:स्थिति बदल दी गई, यह भी बहुत अद्भुत है।
परिवर्तन के सोच से रची गई नाटक गर्भ, अनहद नाद- अनहर्द साउंड ऑफ यूनिवर्स, और न्याय के भंवर में भंवरी ने दर्शकों को विषय से विचार की समझ को एक कलात्मक आकार और उससे उत्पन्न संवेदना की शुरुआत ने उन्हेंं अंदर से झकझोर दिया। दर्शकों का पर्फॉर्मेंस में पार्टिसिपेशन का मतलब यही है कि वह वैचारिक रूप से घुल जाए और मिल जाए। समाज के बारे में जो उनकी समझ है वह उन पर चर्चा करें और एक नया सोच, एक नई समझ पर विचार करें। विचार के संवाद की शुरुआत हुई इस फेस्टिवल में जहां 50 दर्शक अर्जित किए गए हैं इस फेस्टिवल के द्वारा जो सामाजिक और राजनीतिक भक्ती एवं श्रद्धा में विश्वास रखते है। उनके सोच का ट्रांसफॉर्मेशन एक अद्भुत प्लेटफार्म पर हुआ, वैचारिक स्तर पर, कलात्मक दृष्टि से और चर्चा की सहायता से।
यह कलात्मक एकरूपता का परिणाम है जो न्याय के भंवर में भंवरी के द्वारा बबली रावत अपने रंगकर्म के जीवन में इस तरह प्रतीत हुई जैसे वह इस नाटक के धधकती हुई ज्वालामुखी में एक हो गई हो और लेखक के हवन में आह्वाहन दे रहीं हो। उस हवन के दहकती आग के लपटें वहां बैठे हर एक इंसान को, जो दर्शक के रूप में आए थे, अपने हवन के लपटो में समेट लिया और पुराने बदबूदार सोच को भस्म करने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। न्याय के भंवर में भंवरी नाटक के बाद ऐसा लग रहा था मानो कि जैसे वह स्तबध रह गए हो और अपने ही समझ के अर्थी को कंधा दे रहे हो और जब उन्हें मंच पर बुलाया गया तो वह अपने सोच की मयीयत, एक तरह से अंतिम यात्रा के लिए जा रहे हैं ऐसा प्रतीत हो रहा था।
यह पता चला कि दर्शक परिवर्तन की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते हैं। उनसे बात-चीत के दौरान सावित्रीबाई से लेकर भगत सिंह और ऐसे कई क्रांतिकारी कदम पर, अनेक कालों से अवगत कराते हुए उनकेे पितृसत्तात्मक DNA को झकझोरा गया। चर्चा के दौरान एक ब्राह्मण बुजुर्ग महिला ने कहा कि बहुत ही ज्यादा नेगेटिविटी दिखाया गया है। दूसरी तरफ नाटक के बैकग्राउंड से आए हुए एक व्यक्ति ने अपना पक्ष रखते हुए, या यू कह सकते हैं कि वह पूर्ण तरह डिनायल मोड में थे, और उन्होंने कहा कि maharashtra जैसे राज्य में इस तरह का व्यवहार महिलाओं के साथ नहीं होता है। इस तरह का व्यवहार सिर्फ दिल्ली और राजस्थान जैसे शहर में ही होते हैं और हमें सुनने को मिलता है।
उनके यह limited दृष्टि, I am ok वाली स्थीती को उसी वक्त चुनौती दी गई, वहां उपस्थित महिलाओं को काउंट करने के लिए कहा गया और वहां 24 महिलाएं उपस्थित थी जिसमें 6 साल से लेकर 84 साल तक की महिला थी।  उन सब महिलाओं ने कहा कि आज तक उनके जिंदगी में उनके साथ छेड़खानी नहीं हुई हो या उन्होंने भुगता नहीं हो, ऐसा नहीं हुआ है। और यह बात स्पष्ट हो गई कि महिलाओं के साथ जिस बर्ताव के बारे में उस नाटक के माध्यम से सृजन किए गए मंच पर चर्चा हो रही थी, वह विषय हर एक राज्य के साथ, हर एक व्यक्ति के साथ जुड़ा हुआ है और असल में उसका लेना देना एक स्पेसिफिक प्रांत या राज्य से नहीं है, लेकिन यह विषय है पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण तोड़ने की, चुनौती देने की, समझाने की, समझने की, बदलाव लाने की, यह नाटक न्याय के भंवर में भंवरी इस उद्देश्य से लिखा गया है।
सबसे बड़ी उपलब्धि चर्चा की यह रही कि लोगों की दृष्टि जो यह मानने को तैयार नहीं होती कि पितृसत्तात्मक पहलुओ से वह हर रोज़ गुजरते हैं और उसी में जीते हैं, उस सोच को चुनौती नहीं देते और उसको एक्सेप्ट करते जाते हैं, normalise कर देते हैं। यह सोच, यह जीने का तरीका, यह खुद को बचाने की चेष्टा, और डिनायल में रहने की आदत, एक तरह से धरायशी हो गयी और उन्होंने इन बातों, इन तथ्यों को कबूल किया।
उन्हीं दर्शकों में एक वकील ने कहा कि हर वक्त, हर दिन अदालत में इस तरह के बहुत सारे केसेज़ आते हैं जो बतलाते हैं कि महिलाओं के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार हो रहा है, हर रोज़। पर्यावरण के पक्ष कि समझ रखने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि पशुओं के व्यवहार में भी इस तरह का दुर्व्यवहार नहीं होता है। प्रकृति के अनुसार स्त्री जाति को अपने अनुसार चयन करने का अधिकार होता है। यह पूरा संवाद नाटक का दूसरा भाग है ऐसा प्रतीत होता है जब दर्शक नाटक देखने के बाद उसमें शामिल हो जाते हैं, और उसके बारे में खुद के विचार को रखते हैं, और दूसरों के विचार को सुनते हैं। एक घटना और हुई थी जहां पर एक बहुत ही शालीन डॉक्टर ने अपने समझ के लिए वही स्टेज पर माफी मांगी। इस बात का बैकग्राउंड यह है कि जब उन्हें इनवाइट करने के लिए टीम मेंबर गए थे तब उन्होंने यह बोला था कि आपके लेखक निर्देशक के नाटकों से कम्युनिज्म की बू आती है।
उस वक्त जवाब में उनके पास कुछ भी नहीं था कहने को लेकिन जब वह चर्चा के लिए स्टेज पर पहुंचे तब मंजुल भारद्वाज ने यह कहा, की सवाल है कि- रंग कौन सा है आपका? तो मैं कहता हूं “मेरा रंग सफेद है” क्योंकि मैं एक कलाकार हूं, एक रंगकर्मी हूं, और संवाद का रंग सफेद होता है, शांति का रंग सफेद होता है, मोक्ष का रंग सफेद होता है। यह डिपेंड करता है कि आप मुझे कौन से प्रिज्म से देखते हैं, और जब आप मुझे देखेंगे तो आपको हो सकता है कि सफेद में हर रंग दिखे। वैसे मेरा प्रिय रंग हरा है क्योंकि हरा प्रकृति का रंग है, मेरा लगाव भगवा, बसंती पर भी है क्योंकि वह रंग कुर्बानी का है, और लाल मुझे अति प्रिय भी है क्योंकि वह प्रेम का रंग है, और प्रेम के बिना जिंदगी नहीं है। इस दृष्टि ने, इस जवाब ने वहां पर खड़े हर नामी व्यक्ति, हर दर्शक को उनमुक्त कर दिया और वह डॉक्टर ने कहा कि आप जादूगर हैं। इस चर्चा के दौरान यह बात हुई कि वहां उपस्थित इंटेलेक्चुअल ग्रुप थिएटर ऑफ रेलवेसं फिलोसोफी को ना सिर्फ अक्सेप्ट कर रहे हैं, वह उस फिलॉसफी के द्वारा खुद को और भी गहराई से समझना चाहते हैं, और वह चाहते हैं कि साथ में थीयटर आफ रेलवेसं कार्यशाला करें।
बबली रावत से जब मैंने पूछा कि उनका एक्सपीरियंस कैसा रहा इस प्रयोग के द्वारा, उन्हें अलग क्या लगा, तो उन्होंने कहा वहां एक बुजुर्ग जो ७५ साल के हैं वह दर्शक में उपस्थित थे और उनकी खुद की एक नाटक संस्था है, जिसका ६० वर्ष अगले साल पूरा होने वाला है। उन्होंने कहा कि यह नाटक एक पात्री अभिनय होते हुए भी पलके नहीं झुकने देती है और दर्शक को उस नाटक का एक भाग बना लेती है। वह ग्वालियर के हैं और उन्होंने यह तथ्य भी दिया कि इसी तरह का नाटक उन्होंने, 40 वर्ष जब उनके संस्था के पूरे हुए थे, तब मराठी नाटक की प्रसिद्ध अभिनेत्री को बुलाया गया था और इसी तरह का एक पात्री नाटक करवाया था, लेकिन आज बबली रावत जी का अभिनय देखकर उनको वह नाटक फीका लगता है। सही मायने में एक पात्री अभिनय आज उन्हें दिखा है। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस नाटक को ग्वालियर में इन्वाइट करेंगे और वहां के दर्शकों को दिखाना चाहेंगे। इस बात पर बबली रावत जी ने कहा रंगकर्मी के अनुसार मराठी की वरीष्ठ कलाकार के साथ कंपेयर किया गया है तो यह बहुत ही बड़ी बात है उनके लिए और वह इसे एक कॉन्प्लीमेंट की तरह ले रही है और इससे उनको अपनी उपलब्धि का एहसास भी हुआ है।
उनसे दर्शकों ने बहुत सारे सवाल किए जैसे कि इतना बड़ा स्क्रिप्ट, 1 घंटे का लगभग स्क्रिप्ट है, यह आप याद कैसे रख पाते हैं, और जब हम आपको अभिनय करते हुए देख रहे थे तो हमें ऐसा लग रहा था कि हम क्यों नहीं चीखते हैं, हम रोज यह जीते हैं, देखते हैं तो हम क्यों नहीं बोलते हैं। दर्शकों का यह एहसास जो सामने आया चर्चा में, बबली रावत जी को लगा कि दर्शकों ने नाटक के साथ न्याय किया है। यह नाटक नटसम्राट नाटक के तरह अलग अलग रूप और भाव बदल रहे थे और इन भावों को पकड़कर बबली जी ने बहुत ही बखूबी से हर रूप की प्रस्तुति की और अंत में भंवरी के नाटक के भावनाओं का पूरा निचोड़ जिसमें रोना धोना जायज है वह उन्होंने प्रस्तुत किया।
बबली रावत जी से मैंने यह भी पूछा कि उन्होंने एक पात्री नाटक पहले भी किया है और अपने जीवन के अनेक साल वह रंगकर्मी रह चुकी हैं और कई नाटक में उन्होंने भाग लिया है चाहे वह मंच नाटक हो गढ़वाली नाटक हो या स्ट्रीट नाटक हो तो यह नाटक उनके लिए अलग किस तरह से है, तो उन्होंने कहा कि यह नाटक न्याय के भंवर में भंवरी ऐसा स्क्रिप्ट है जिस पर मुझे विश्वास है कि मुझे राष्ट्रीय अवार्ड अगर दिला सकता है तो यही है।
खुद को वह एक बहुत ही इमोशनल पर्सन कहती हैं, मानती हैं और खुद के इमोशन पर कंट्रोल नहीं हो पाता है वह इसे एक्सेप्ट करती हैं, लेकिन इस नाटक के द्वारा उन्होंने यह परिवर्तन महसूस किया है कि यह पूरा नाटक उन्होंने बिना इमोशन को अपने ऊपर हावी होते हुए परफॉर्म किया और पूरी तरह से वह कैरेक्टर और कलाकार के बीच के जो चैलेंज है, उन पर कंट्रोल किया और इसे रोने धोने वाला नाटक ना बनाकर एक संवाद वाला नाटक बना दिया इस तरह से उन्होंने इस पूरे नाटक की स्क्रिप्ट के साथ पूर्ण तरह से न्याय किया और वह बहुत खुश थी कि 99% इमोशन पर कंट्रोल करना उन्होंने सीख लिया है।
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अपना 25 साल का उत्सव मना रहा है इसकी शुरुआत दिल्ली फेस्टिवल से हुई और मुंबई में दादर के शिवाजी मंदिर के बाद पनवेल में वासुदेव बलवंत फड़के ऑडिटोरियम में सादर हुई। थिएटर ऑफ़ रेलेवंस फिलॉसफी के जन्मदाता मंजुल भारद्वाज है। इस फेस्टिवल में जो कलाकारों ने काम किया है वह है बबली रावत, कोमल खामकर, अश्विनी नांदेडकर, सायली पावसकर, योगिनी चौक, और तुषार म्हस्के। इन तीनों फेस्टिवल में तीन नाटक प्रस्तुत किए गए जिनको मंजुल भारद्वाज ने लिखा है और निर्देशित किया है। गर्भ, अनहद नाद- अनहर्द साउंड्स ऑफ यूनिवर्स, न्याय के भवर में भंवरी, यह तीनों नाटक थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सिद्धांतों पर आधारित है जो मानवता की ओर कदम बढ़ाता है और कलात्मक, सांस्कृतिक चेतना की मशाल को रोशन करता है।

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