सृजन बिना प्रतिरोध के नहीं हो सकता – Resistance – A Revolutionary Process of Creation

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“सृजन बिना प्रतिरोध के नहीं हो सकता”

by Manjul Bhardwaj

विशेष , , बृहस्पतिवार , 28-12-2017


मंजुल भारद्वाज

सृजन के सृजन का बीजमन्त्र है ‘प्रतिरोध’।

बिना प्रतिरोध के सृजन नहीं हो सकता।

जैसे बीज अपने ही आवरण को फाड़ कर अंकुरित होकर नए रूप में सृजित करता है अपने आप को।

ये वैश्विक प्रक्रिया है। उत्क्रांति सृजन प्रक्रिया का वक्त के चक्र पर चलने वाला अनंत आन्दोलन है जो मनुष्य के पहले और बाद भी रहेगा ..आदि से अनंत तक …

सृजनकार की सृजन प्रतिबद्धता, दृष्टि, समग्रता यह तय करती है की वो सत्ता पोषित होकर ‘सत्ता’ भक्ति के कसीदे पढ़ेंगे या मनुष्यता को निरंतर ‘मनुष्य’ बनाने की अनंत साधना में लीन होकर समाज, व्यवस्था, सत्ता और संस्कृति को अपने सृजन से झाड़ते,पोछते हुए विकृतियों से बचाते रहेंगे!

चूँकि सृजन ‘विद्रोह’ है और सृजनकार ‘विद्रोही’ इसलिए सत्ता हमेशा से सृजन और सृजनकार से डरती है। इसलिए सृजनकार को सत्ता ‘पालतू’ बनाकर अपने बाड़े में रखना चाहती है या सभ्य रूप में कहें तो अपना पट्टा डालकर अपने ‘दरबार’ में अपने हित साधने के लिए उनको पालती है। ..ये आदिकाल से होता आया है ..आज भी जारी है ..हाँ आज इसको हम ..ग्रांट, अनुदान आदि के नाम से जानते हैं।

किसी सम्भ्रम में न रहें। सत्ता कोई भी हो चाहे सामंतवादी, साम्यवादी, लोकतान्त्रिक या पूंजीवादी सब मिलकर षड्यंत्रवश सृजनकार को ‘पालतू’ बनाते हैं। मय-मदिरा और शबाब ‘सत्ता’ के जांचे परखे कारगर ब्रह्मास्त्र हैं ‘सृजनकार’ के शिकार करने के ..और इनके उपभोग से ‘सृजनकार’ दरबार में रेंगेंने लगते हैं और अपनी कुदरती सृजन प्रतिभा की ‘रूह’ का गला घोंट ‘सृजन’ शिल्प की बैसाखी से अपनी जीवन यात्रा की वैतरणी पार करते हैं। और सत्ता और सत्ताधीश अपनी अपनी ‘विचारधारा’ के अंतर्गत ‘सृजनकारों’ को विभाजित कर लेतें हैं।

एक भाग ऐसा है जो बिना किसी प्रतिबद्धता के सिर्फ़ ‘भोग’ के लिए सृजन करते हैं जो ‘पूंजीवादी’ चाहते हैं ..दूसरा भाग अपने को ‘जनवादी’ कहता है ..जो दूसरी विचारधारा की सत्ता की प्रतिबद्धता के लिए सृजित करते हैं।

चन्द ऐसे ‘सृजनकार’ होते हैं जो इन दो ध्रुवीय सत्ताओं को नकार कर अपना सृजन करते हैं। ऐसे सृजनकार लोभ-लालच, प्रतिष्ठा, सत्ता के आभूषणों, अलंकारों से दूर ‘जनमानस’ के लिए सृजन करते हैं। ये विद्रोही सृजन संत किसी भी वाद और अपवाद का शिकार हुए बिना ‘इंसान और इंसानियत’ के लिए अपना सृजन करते हैं। 

यही वो ‘सृजन’ वर्ग है जो अपनी सृजन कला से ‘मनुष्य’ को ‘मनुष्य’ बनाने  की ‘कला’ में माहिर है ..लीन है ..तल्लीन है। दुनियादारी के व्यवहार से अनभिज्ञ ..ये जुनूनी सिर्फ़ काल के  गर्भ से निकलते हैं और काल को मुक्त कर, काल को सृजते हुए, काल में समां जाते हैं। नए काल का सृजन करते हुए, इसलिए लेखक ..काल को लिखता है ..और कलाकार ‘कल’ को आकार देता है ..बाकी सब राजकवि, राज नृतक.. राज नट ..राजकाज के दस्तावेजों में सजतें हैं। कालांतर में विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में अपने अपने काल में सत्ता की खुशामद का राग अलापतें हैं और एक विशेष वर्ग प्रोफेसर बनकर छात्रों को इनकी क़िस्सागोई में पीएचडी कराकर कागज़ घिसने के क्रम में धकेल देतें हैं। और ऐसे सृजनकारों की भीड़ हमेशा सत्ता के मवाद को ‘चन्दन’ समझ प्रचारित और प्रसारित करती है।

मिथकीय ‘नारद’ से लेकर आधुनिकता के औपनिवेशिक काल में शेक्सपियर जैसे साहित्य के चुइंगम ने ऐसे ही सृजनकारों की भीड़ तैयार की है .जबकि कबीर और बहना बाई जनमानस में सुनाई और दिखाई देते हैं ..जीते हैं !

जन्म 

मनुष्य या प्राणी जब जन्म लेते हैं तो अपनी ‘जननी’ का गर्भ फाड़ कर बाहर आते हैं। अपनी जननी के शरीर से बगावत कर अपनी माँ के गर्भाशय में अपने शरीर के आकार के लिए ‘संघर्ष’ कर जगह बनाते हैं अपने प्रतिरोध से ‘गर्भाशय’ को सृजन की प्रयोगशाला बनाते हैं। प्रसूति उसी प्रतिरोध का नाम है और जननी के शरीर से अपने शरीर के होने का नाम ही ‘जन्म’ है।

इसी क्रम में पालन पोषण की प्रकिया में प्रतिगामी ‘मूल्यों’ का प्रतिरोध करता है हर बच्चा। बच्चों की जिज्ञासा तार तार कर देती है वयस्कों की व्यवस्था और सत्ता को, जिसको बड़ी बेरहमी से बच्चों को कंडिशन्ड करके बचाया जाता है। फ़िर भी अपने ‘अस्तित्व’ के लिए अपने ‘पालकों’ का प्रतिरोध करता है हर मनुष्य। ये दीगर बात है की वो केवल अपने जीवन यापन तक सीमित होकर रह जाता है और व्यवस्थागत बदलाव नहीं कर पाता…।

सत्ता 

ऐसा ही ‘सत्ता’ के परिवर्तन आयामों में होता है। इतिहास में दर्ज है की एक सत्ता ने अपने प्रतिरोध से दूसरी ‘सत्ता’ स्थापित की चाहे वो सामन्ती सत्ता हो, पूंजीवादी या आज की लोकतान्त्रिक सत्ता। एक पक्ष अपने प्रतिरोध से ‘सृजन’ करता है अपनी सत्ता का। ये दीगर बात है की ये केवल ‘सत्ता’ हस्तांतरण होता है ‘व्यवस्थागत’ परिवर्तन नहीं होता। इससे ये भी प्रमाणित नहीं होता की ये ‘सत्ता’ सृजन मानव का विकास करती है या मानव को एक ‘जंगली’ पशु के रूप में पालती है। यहाँ भूमिका है सृजनकारों की जो अपने ‘सृजन’ से मनुष्य को ‘जंगली’ पशु की गुहा से निकालकर मनुष्य बनने के लिए उत्प्रेरित करें! पर ‘सत्ता’ ये होने नहीं देती यहाँ सत्ता के सभी आयाम शामिल है सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक। इन चारों आयामों के चक्रव्यूह को ‘सृजनकार’ का अभिमन्यु स्वरूप भेद नहीं पाता और ‘धर्म’ स्थापना के नाम पर कोई कृष्ण युद्ध की विभीषिका के वेदी पर ‘नरसंहार’ को जायज ठहराने की ‘गीता’ रचकर मानवता को सदा सदा के लिए ‘युद्धौन्माद’ में धकेल कर चला जाता है। युगों-युगों तक आने वाली सत्ता इससे अभिशप्त है। ‘सृजनकार’ को अपने ‘सृजन’ से इस अभिशाप से मानवता को मुक्त करना है, पर अफ़सोस यह है की ‘सृजनकार’ इस दृष्टि से अनभिज्ञ है और यह त्रासद है की ‘सृजनकार’ को अपने दायित्व का ज्ञान और भान भी नहीं है। यह ‘सृजनकार’ अपने काल में बाकी मनुष्यों की भांति जीवन गुजार कर खाक़ में मिल जाता है और ये खाक़ उडती रहती है सदियों तक, पर अपने सृजन से इस खाक़ में प्रतिरोध की ‘चिंगारी’ नहीं सुलगा पाता जो ‘काल के गर्भ में ‘ज्वालामुखी’ की तरह धधकती रहे और अपने ‘विस्फोट’ से मनुष्य की ‘जंगली और हिंसक’ प्रवृत्ति से उसको मुक्ति दे! पर सत्ता के साये में भोग विलास में चूर ये ‘सृजनकार’ रेंगते हुए कीड़े मकोड़ों की भूमिका में सत्ता की गाथा भिन्न भिनाते रहते हैं। और जनता अपनी दुनियादारी की चक्की में पिसती रहती है और इस चक्की को अपना जीवन चक्र समझ ‘भगवान’ के चमत्कार की आस में सदियाँ गुजारती है। …इसलिए हर युग में एक अवतार ‘वसुंधरा’ का उद्धार करता है ..पर दूसरे युग का सृष्टि चक्र नहीं बदलता क्योंकि ‘सृजनकार’ अपनी भूमिका नहीं निभाता …

मानवीय विष

मानव का रहन सहन, जीवन व्यवहार, जीवन दृष्टि, भाषा और उसका भूगोल एक ऐसे जाल में काल के साथ उलझ जाते हैं जिसको हर पल सुलझाना अनिवार्य है। व्यक्तियों, समाजों और देशों की व्यवस्थाओं की होड़ ‘वर्चस्ववाद’ को जन्म देती है। ये ‘वर्चस्ववाद’ मानव को एक ‘जंगली पशु’ के रूप में प्रस्थापित करता है और पूरी मानवता ‘हिंसा’ के कुचक्र में फंस जाती है। विचारों की संकीर्णता मनुष्य की भावनाओं को विषैला करती है।..प्यार, नफ़रत, चाहत, घृणा, गुस्सा, जलन, द्वेष हिकारत में बदल जाती हैं और ये मानवीय विष पूरे विश्व को अमानवीय बनाता है। इस अमानवीय व्यवहार को हर ‘सत्ता’ अपने ‘वर्चस्ववाद’ का हथियार बनाती है। ‘सृजनकार’ को अपने ‘सृजन’ से  मनुष्य के विचारों की संकीर्णता को तोड़कर उसे ‘वर्चस्ववाद’ के रसातल से निकाल कर निरंतर ‘मनुष्य’ बने रहने के लिए उत्प्रेरित करना है। भावनाएं मनुष्य का कुदरती श्रंगार हैं .. उन्हें विचारों की वैमनस्यता से बचाकर शुद्ध और पवित्र भाव से ओतप्रोत कर ‘प्रेम’ भाव की सरिता से लबालब करना हैं जिससे ‘अविरल’ मानवीय धारा बहती रहे और हर मानव अपने मानवीय विष से मुक्ति पा सके।  मनुष्य को उसके विष से मुक्ति ‘सृजनकार ही दिला सकता है …और ये हर पल, दिन , वर्ष , सदी और युगों तक सतत करना मानवता के लिए प्राणों की तरह अनिवार्य है।

जड़ता और अराजकता

हर काल में मनुष्य अपने जीने के लिए एक ‘व्यवस्था’ का निर्माण करता है। ये व्यवस्था एक निश्चित समय के मंथन , मनन, अनुभव और व्यवहार से बनती है। आने वाली पीढ़ियां इसे अपनाती हैं। उसका अनुकरण करती हैं। ये अनुकरण उन्हें एक संस्कार की प्रक्रिया से गुजारता है। समाज एक संस्कार को अपनाता है। समाज का संस्कार और उसकी कृति एक संस्कृति को ‘जन्म’ देते हैं। एक विशिष्ट समय पर एक विशेष ‘व्यवस्था’ बहुत उपयोगी हो सकती है पर दूसरे ही पल गैर ज़रूरी। समय हर पल बदलता है पर व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था जड़ हो जाती है या यूं कहें जड़ता का नाम ही व्यवस्था है। ये व्यवस्था मनुष्य अपनी ‘सभ्यता’ के अनुसार गढ़ता है पर काल के चक्र से हर पल बदल नहीं पाता।

‘सत्ता’ संघर्ष या कुदरती प्रक्रियाओं से ‘व्यवस्था’ और मानवीय ‘सभ्यताएं’ नष्ट होती रहीं हैं पर मनुष्य व्यवस्थाओं की ‘जड़ता’ को हटाने में नाकाम रहा है। सत्ता चाहे भी तो नहीं कर पाती नहीं कर सकती क्योंकि ‘व्यवस्था’ परिवर्तन ‘अराजकता’ के दौर से गुजरता है, जो कोई भी सत्ता नहीं चाहती। इसलिए अपनी ही ‘व्यवस्था’ की सड़ांध में सड़ता है ये मनुष्य। इस सड़ती ‘व्यवस्था’ को वैचारिक परिवर्तन से ‘सृजनकार’ बिना अराजकता के बदल सकता है। जड़ता और अराजकता के ‘चक्रव्यूहों’ को अपने ‘सृजन’ से भेदता है ‘सृजनकार’।

सृजनकार हर पल खत्म होते मानव जीवन को अपने सृजन की संजीवनी से संतुलित कर बिना अराजक हुए ‘जड़’ होने से बचाता है। इस क्रम में ‘सृजनकार’ अपनी सृजन प्रक्रिया के प्रतिरोध से अपनी जड़ता को स्वयं ‘तोड़ता’ है। इसलिए बिना प्रतिरोध सृजन नहीं हो सकता।

(रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज “थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत के सर्जक व प्रयोगकर्ता हैं। वे एक अभिनेता हैं तो साथ ही लेखक और निर्देशक भी। मुंबई में रहने वाले मंजुल रंगकर्म को जीवन की चुनौतियों के खिलाफ लड़ने का हथियार मानते हैं।)

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